स्याह परदे पे खिले कुछ चित्र यूँ विचलित हुए
बंद नैनों से निकलकर मन पे वो चर्चित हुए
कई पहचाने से खांचे और कई अनजान से
साथ में मिलकर हैं आकारित नए निर्माण से
क्या ये कोई प्रेरणा है या प्रभु का कार है
करना है क्या मुझको साक्रित या कहीं साकार है
ढूँढने उसको निकलता कैसे दिशाहीन मैं
रेत में कोई पग नहीं थे छत्र से विहीन मैं
और भी कुछ सम मेरे थे पास में मेरे कहीं
पूछा पाँव छिल गए इस आस में तेरे कहीं
साथ जो हम सब हुए तो चित्र भी विस्तृत हुआ
छा गया मन पटल पे और अमिट सा वो स्मृत हुआ
कष्ट थे कईयों को और थे कई भटके हुए
कुछ सुलभ से साज़ थे और थे कई चटके हुए
पर ना कोई ऐसा था जो हर किसी के हाँथ हो
हर दिशा में रौशनी दे हर कदम पे साथ हो
मत से, श्रद्धा से, धर्म से और एक विश्वास से
करने को कुछ सबल, प्रथक, एक स्वरित रास से
कृति की आकांक्षा से चित्र को रंगने चले
हम मनुजन करने साक्रित स्वप्न को अपने चले